तकनीक हमें जोड़ नहीं तोड़ रही है
पिछले दिनों तबीयत कुछ खराब थी तो डॉक्टर के यहां बैठा अपनी बारी का इंतजार कर रहा था। सोचा, जब तक बारी आती है तब तक चलो अपने दोस्त से बात कर ली जाए। उठकर बाहर आ गया और मोबाइल से अपने दोस्त को फोन लगा लिया। थोड़ी देर बाद जब लौटा तो पुराने दिन याद आ गए। एक वो भी जमाना था, जब डॉक्टर या वैद्य के पास बैठ अपनी बारी का इंतजार करते हुए लोग एक दूसरे से बातें कर लेते थे और एक नया रिश्ता बन जाता था। मगर आज तकनीक हमें वापस उन्हीं रिश्तों में धकेल देती है, जो हमारे कम्फर्ट जोन में है, नए रिश्ते बनाने का मौका ही नहीं देती।
कहने का मतलब है कि टेक्नॉलजी लोगों को करीब नहीं ला रही, बल्कि दूर कर रही है। व्यक्ति अंतर्मुखी बनता जा रहा है। हो सकता है इसके विपक्ष में तर्क देने वाले लोग यही कहेंगे कि फेसबुक, ऑर्कुट और ट्विटर जैसी तमाम सोशल साइट्स लोगों को करीब ले आई हैं। मगर मेरी सोच अलग दिशा में है। परंपरागत तरीकों को छोड़ सिर्फ वर्चुअली करीब आने में कैसी सफलता है?
यहां एक चीज की चर्चा करना जरूरी समझता हूं। तकनीक ने एक नई चीज ईजाद की है 'सेकंड लाइफ'। कंप्यूटर पर एक कम्यूनिटी के रूप में सेकंड लाइफ का फलसफा एक अजीबोगरीब फिनॉमिना है। यह एक दूसरी ही जिंदगी है, जहां आप अपने आप को डिजाइन कर एक कैरक्टर का रूप लेते हैं और उस दूसरी दुनिया के मेंबर बन जाते हैं। यह एक ऐसी दुनिया है, जहां वे तमाम चीजें उपलब्ध हैं जो वास्तविक दुनिया में होती हैं। जहां आप कुछ भी खरीद सकते हैं, ऑफिस खोल सकते हैं, रिश्ते बना सकते हैं, शादी कर सकते हैं, तलाक ले सकते हैं और यहां तक कि बच्चे भी गोद ले सकते हैं। दुनिया में कई लोग उस दुनिया का हिस्सा बने हैं। वहां जो जैसा नहीं है, वैसा बनने की ऐक्टिंग कर रहा है। मैं भी अनुभव लेने के लिए वहां पहुंचा। मैंने पाया कि दुनिया के अलग-अलग कोने में बैठे लोग वहां वर्चुअली एक दूसरे से जुड़े हैं। दरअसल यह एक तरह की मानसिक स्थिति है, जिसमें दिमाग तो जुड़ा है पर शरीर नहीं।
तकनीक की वजह से यही स्थिति हमारी होती जा रही है और हम ऐसे टर्म से गुजर रहे हैं, जहां हमारे शरीर की भूमिका कम होती जा रही है और दिमाग की ज्यादा, जबकि पहले अपने अस्तित्व को जीवित रखने के लिए शरीर को मेहनत करनी होती थी। मगर अब तकनीक ने हमारे चारों और ऐसी चीजें मुहैया करवा दी हैं कि जिसमें शरीर का रोल ही नहीं बचा है। अब शरीर और दिमाग की दूरी बढ़ गई है, जहां दिमाग अपने आपको आगे समझने लगा है। यह दूरी धीरे-धीरे और बढ़ेगी। मगर यह सही नहीं है। यही वजह है कि हम अस्वस्थ होते जा रहे हैं, क्योंकि आधे से ज्यादा वक्त तो हमारा दिमाग ही ले लेता है और शरीर के हिस्से कुछ नहीं आता। इस तरह अपने आप में रहने वाले व्यक्तियों का निर्माण हो रहा है। आज पैरंट्स शिकायत करते हैं कि टीनएजर्स अपने कमरे से बाहर ही नहीं निकलते। वजह साफ है वे रीयल के बजाय वर्चुअल रिश्तों से जुड़ते जा रहे हैं क्योंकि वह अपनी सुविधा के अनुसार रिश्ते बना रहे हैं। वह जब चाहें किसी से चैट करें, जब चाहें न करें या जब चाहें स्क्रीन पर आएं या न आएं।
इसलिए मेरा मानना है कि आने वाली पीढ़ी के लिए शरीर और दिमाग के बीच तालमेल बिठा पाना और मुश्किल हो जाएगा। जिस तरह मनुष्य प्रकृति के नियमों को तोड़ रहा है, उससे तो यही लगता है कि आने वाले समय में एक बड़ा संकट खड़ा हो सकता है। हम एक ऐसी सभ्यता की ओर बढ़ रहे हैं जहां स्पर्श या आलिंगन जैसी चीजें महत्वहीन हो जाएगी। आंख से टपकते आंसुओं के कोई मायने नहीं होंगे। हम एक जीवन को बर्खास्त करके दूसरे जीवन को जी रहे हैं। हम एक अंतहीन जीवन की कल्पना कर रहे हैं, जिसमें कहीं न कहीं विस्फोट होगा ही। बेहतर है समय रहते योग, ध्यान और प्राकृतिक तरीकों से शरीर और दिमाग की दूरी कम कर ली जाए।
12:30 AM
Sushil


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