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| खादी और ग्रामोद्योग राज्यमंत्री गोलमा देवी |
'खादी में काम की व्यापक संभावनाएं'
बीकानेर। खादी और ग्रामोद्योग राज्यमंत्री गोलमा देवी ने कहा कि खादी के क्षेत्र में काम की व्यापक संभावनाएं हैं,जितना काम होगा। उतना ही विकास होगा। राज्यमंत्री बुधवार को यहां राज्य स्तरीय खादी सुधार एवं विकास कार्यशाला में मुख्य अतिथि के रूप में बोल रही थीं। उन्होंने खादी संस्थाओं के प्रतिनिधियों से समर्पण भाव से काम करने का आह्वान किया।
महापौर भवानी शंकर शर्मा ने कहा कि ऊन के उत्पादों के लिए बीकानेर ने देश में अपनी पहचान बनाई है। उन्होंने खादी से बने उत्पाद में और निखार लाने की आवश्यकता जताई।
बीकानेर को मिलेगा 3 करोड 38 लाख का अनुदान
खादी और ग्रामोद्योग आयोग के निदेशक जे.एल. मीणा ने कहा कि एशियन विकास बैंक से भारत सरकार ने 617 करोड रूपए का ऋण खादी सुधार के लिए लिया है। इससे देश की 300 खादी संस्थाओं को लाभ मिलेगा। इनमें से बीकानेर की पांच संस्थाएं हैं। मीणा ने बताया की चयनित संस्थाओं में सुधार होने से लगभग दो सौ से तीन सौ बेरोजगारों को रोजगार मिलेगा। उन्होंने बताया कि बीकानेर की संस्थाओं को 3 करोड 38 लाख रूपए का अनुदान दिया जाएगा।
खादी और ग्रामोद्योग आयोग के निदेशक जे.एल. मीणा ने कहा कि एशियन विकास बैंक से भारत सरकार ने 617 करोड रूपए का ऋण खादी सुधार के लिए लिया है। इससे देश की 300 खादी संस्थाओं को लाभ मिलेगा। इनमें से बीकानेर की पांच संस्थाएं हैं। मीणा ने बताया की चयनित संस्थाओं में सुधार होने से लगभग दो सौ से तीन सौ बेरोजगारों को रोजगार मिलेगा। उन्होंने बताया कि बीकानेर की संस्थाओं को 3 करोड 38 लाख रूपए का अनुदान दिया जाएगा।
कावनी में बिजली गिरी
बीकानेर। अंचल में बुधवार को लगातार दूसरे दिन भी हुई बारिश से किसानों में खुशी की लहर है। सालों बाद इस बार भरपूर फसल की आस पूरी होती नजर आ रही है। जिले के अधिकांश हिस्सों में हल्की बारिश के समाचार है। श्रीकोलायत के कावनी गांव में बरसात के साथ बिजली गिरने से तीन मकानों को नुकसान पहंुचा है। जन हानि की खबर नहीं है।
बीकानेर शहरी क्षेत्र में दिन भर की उमस के बाद शाम 7.10 पर रिमझिम बारिश का दौर शुरू हुआ जो आधे घंटे तक चला। इस दौरान 5.2 मिमी पानी बरसा।
श्रीडूंगरगढ क्षेत्र में आधे घंटे हल्की बरसात हुई। यहां अपराह्न पौने चार बजे से सवा चार बजे तक करीब 7 मिमी बारिश दर्ज की गई। शाम के समय कोडमदेसर, नापासर, नाल में भी अच्छी बारिश हुई है। मोमासर में दोपहर एक बजे से पंद्रह मिनट तक पानी बरसा। आडसर और धीरदेसर में भी बूंदाबांदी के समाचार हैं। जिले के अन्य क्षेत्रों में बादल तो छाए रहे, लेकिन बारिश नहीं हुई।
दीपावली के बाद ही मिलेगी साइकिल
बीकानेर। शिक्षा विभाग में इस बार भी साइकिल खरीद की प्रक्रिया में देरी के चलते छात्राओं को दीपावली के बाद इनका वितरण हो पाएगा। निविदाएं खोलने के बाद अब सम्बन्धित कंपनी से साइकिल की कीमत कम कराने को लेकर बातचीत चल रही है। कीमत तय होने पर आपूर्ति के आदेश जारी किए जाएंगे। इस प्रक्रिया में अगस्त माह बीत जाने का अनुमान है। आपूर्ति के आदेशों के तीन महीने में कंपनी को जिला स्तर पर साइकिलें पहुंचानी होगी। तब तक दीपावली का त्योहार निकल जाएगा। अगर सब कुछ तय कार्यक्रम के अनुसार भी हुआ तो अर्द्धवार्षिक परीक्षा से ठीक पहले छात्राओं को साइकिल मिल पाएगी।
गौरतलब है कि हर साल हो रही देरी को देखते हुए निदेशालय ने राज्य सरकार से ग्रामीण बालिकाओं को कक्षा आठ पास करने के बाद कक्षा नौ में ही साइकिल वितरण की अनुमति मांगी थी। ताकि प्रक्रिया में देरी होने के बावजूद कक्षा दस के दौरान बालिका साइकिल का पूरा उपयोग कर सके। पर, इस मांग को राज्य सरकार ने ठुकरा दिया।
जवाब का इंतजार
'निविदा खोल दी गई है। अब हमने कंपनी को विभाग द्वारा तय कीमत 2275 रूपए प्रति साइकिल का ऑफर दिया है। कंपनी का जवाब आने के बाद आपूर्ति के आदेश जारी किए जाएंगे।'
भास्कर ए. सावंत, निदेशक, माध्यमिक शिक्षा
'निविदा खोल दी गई है। अब हमने कंपनी को विभाग द्वारा तय कीमत 2275 रूपए प्रति साइकिल का ऑफर दिया है। कंपनी का जवाब आने के बाद आपूर्ति के आदेश जारी किए जाएंगे।'
भास्कर ए. सावंत, निदेशक, माध्यमिक शिक्षा
जिंदगी के बाद भी नहीं
बीकानेर। भारतीय जीवन बीमा निगम की पंचलाइन है 'जिंदगी के साथ भी और जिंदगी के बाद भी', लेकिन जब मामला शिक्षा विभाग के नवनियुक्त शिक्षकों का हो, तो 'बीमा का लाभ न जिंदगी के साथ, न जिंदगी के बाद।' सोमवार को खारी फांटे पर हुई दुर्घटना में एक साथ आठ शिक्षकों की मौत हुई थी। जिनमें दो नवनियुक्त शिक्षकों की बीमा की पहली कटौती मार्च में हो गई, लेकिन अकर्मण्यता का नमूना पेश करते हुए ब्लॉक कार्यालय ने यह राशि समय पर बीमा विभाग तक नहीं पहुंचाई। नतीजतन अपने वेतन से कटौती कराने के बाद भी इन शिक्षकों के परिजनों को बीमा का लाभ नहीं मिल सकेगा।
हादसे में काल कवलित हुए शिक्षक माधोसिंह और शिक्षिका संतोष पडिहार को जनवरी 2010 में परीवीक्षा काल पूर्ण होने पर स्थायी किया गया था। इनकी बीमा सम्बन्धी कटौतियां मार्च में की जानी थी। समय पर कटौती होकर पॉलिसी नहीं बनने के कारण इन्हें सामूहिक दुर्घटना और व्यक्तिगत बीमा के लाभ नहीं मिल पाएंगे।
यह तो उदाहरण मात्र है। कमोबेश यही स्थिति राज्य लोक सेवा आयोग से चयनित होकर वर्ष 2008 में श्रीकोलायत ब्लॉक में लगे 284 तृतीय श्रेणी शिक्षकों की है। ब्लॉक प्रारम्भिक शिक्षा अधिकारी ने परीवीक्षा काल इस साल जनवरी में पूरा होने के बावजूद मार्च बीत जाने तक बीमा राशि सम्बन्धित विभाग को नहीं भेजी। मार्च के वेतन बिलों में आक्षेप के बाद बीमा सम्बन्धी कटौतियां की गई। शिक्षकों के सामूहिक दुर्घटना बीमा और राज्य बीमा की राशि का डिमाण्ड ड्राफ्ट अप्रेल में बीमा एवं प्रावधायी निधि विभाग को भेजा गया। इसके बाद भी प्रक्रिया में देरी के चलते शिक्षकों की बीमा पॉलिसी नहीं बनी। ऎसे में इन शिक्षकों को न तो सामूहिक बीमा का लाभ मिलने की सूरत है, न व्यक्तिगत जीवन बीमा।
ये भी महरूम
शिक्षकों की वैकल्पिक व्यवस्था का खामियाजा भी इस दुर्घटना में हताहत हुए दो शिक्षकों को उठाना पडेगा। इनमें से मदन लाल पडिहार विद्यार्थी मित्र और मीना सैन पैराटीचर थीं। विभाग की स्थायी सेवा नहीं होने के कारण इन्हें बीमा सम्बन्धी लाभ नहीं मिल पाएंगे।
शिक्षकों की वैकल्पिक व्यवस्था का खामियाजा भी इस दुर्घटना में हताहत हुए दो शिक्षकों को उठाना पडेगा। इनमें से मदन लाल पडिहार विद्यार्थी मित्र और मीना सैन पैराटीचर थीं। विभाग की स्थायी सेवा नहीं होने के कारण इन्हें बीमा सम्बन्धी लाभ नहीं मिल पाएंगे।
हमने आक्षेप लगाए थे
'वेतन में से कटौती कर बीमा की राशि हमें भेजने का काम शिक्षा विभाग के सम्बन्धित अधिकारी का था। उन्होंने समय पर कटौतियां नहीं की तो हमारे कर्मचारी ने वेतन बिल पर आक्षेप भी लगाए थे। समय पर किश्त नहीं मिलने पर शिक्षकों की पॉलिसी नहीं बन पाई। ऎसे में शिक्षकों को बीमा का लाभ नहीं मिल पाएगा।'
डीबीएस भण्डारी, उपनिदेशक, बीमा एवं प्रावधायी निधि विभाग
'वेतन में से कटौती कर बीमा की राशि हमें भेजने का काम शिक्षा विभाग के सम्बन्धित अधिकारी का था। उन्होंने समय पर कटौतियां नहीं की तो हमारे कर्मचारी ने वेतन बिल पर आक्षेप भी लगाए थे। समय पर किश्त नहीं मिलने पर शिक्षकों की पॉलिसी नहीं बन पाई। ऎसे में शिक्षकों को बीमा का लाभ नहीं मिल पाएगा।'
डीबीएस भण्डारी, उपनिदेशक, बीमा एवं प्रावधायी निधि विभाग
डिमाण्ड ड्राफ्ट भेज दिया था
'हमने तो अप्रेल में शिक्षकों के वेतन में से कटौती कर डिमाण्ड ड्राफ्ट बीमा एवं प्रावधायी निधि विभाग के निदेशक को भेज दिया था। शिक्षक माधोसिंह के पॉलिसी नम्बर हमारे पास नहीं हैं।'
रणसिंह श्योरण, ब्लॉक प्रारम्भिक शिक्षा अधिकारी, श्रीकोलायत
'हमने तो अप्रेल में शिक्षकों के वेतन में से कटौती कर डिमाण्ड ड्राफ्ट बीमा एवं प्रावधायी निधि विभाग के निदेशक को भेज दिया था। शिक्षक माधोसिंह के पॉलिसी नम्बर हमारे पास नहीं हैं।'
रणसिंह श्योरण, ब्लॉक प्रारम्भिक शिक्षा अधिकारी, श्रीकोलायत
नगदी-जेवरात के चक्कर में आए, बंदूक ले गए
बीकानेर। सदर थानान्तर्गत सार्दुलगंज में मंगलवार रात चोर ट्रांसपोर्ट व्यवसायी के घर से 12 बोर की एक बंदूक और अन्य सामान चोरी कर ले गए। घरवालों को घटना का पता बुधवार सुबह तब लगा जब कमरों में रखा सामान बिखरा हुआ देखा। पुलिस ने मामला दर्ज कर चोरों की तलाश शुरू कर दी है। हालांकि और क्या सामान चोरी हुआ इसकी सूची पुलिस को अभी मिली नहीं है।
यह वारदात सार्दुलगंज में मकान ए-29 में रहने वाले ट्रांसपोर्ट व्यवसायी रोशनलाल आहूजा के घर हुई। चोर जब घुस तब घर के सभी सदस्य गहरी नींद थे। रोशनलाल के पुत्र राकेश आहूजा ने सदर थाना पुलिस को सूचना दी है कि उसके घर से चोर स्टोर में रखी एक बंदूक चोरी कर ले गए। घर का अन्य सामान भी बिखरा हुआ मिला। उसमें से कौनसा सामान गायब हुआ है, यह देखने पर पता चलेगा। घटना की सूचना मिलने पर मौके पर पहुंचे वृत्ताधिकारी (सदर) सरजीत सिंह, थानाप्रभारी भवानी सिंह ने एफ.एस.एल. तथा डॉग स्कवायड को वहां बुलाकर मुआयना कराया।
तालाब में डूबने से बालक की मृत्यु
बीकानेर। श्रीरामसर रोड स्थित हर्षोल्लाव तालाब में डूबने से एक बालक की मृत्यु हो गई। उसका शव करीब 12 घंटे बाद बुधवार सुबह तैरता हुआ मिला।
घटना के अनुसार सुथारों की बडी गुवाड निवासी सुंदरलाल सुथार अपने दो पुत्रों के साथ बुधवार शाम हर्षोल्लाव तालाब गया था। वहां उसका छोटा पुत्र मोहित (13) अपने पिता को बिना बताए ही तालाब में नहाने चला गया और इसी दरम्यान वह डूब गया। तब इसकी भनक न तो वहां मौजूद उसके पिता को लगी और न ही अन्य लोगों को। घरवाले रात भर तालाब और अपने परिजनों के यहां मोहित की तलाश करते रहे, लेकिन उसका पता नहीं चला। गुरूवार सुबह हर्षोल्लाव तालाब स्थित मंदिर के पुजारी ने बालक के शव को पानी में तैरता हुआ देखा। बाद में पता चला कि वह शव मोहित का ही था। जिसे घरवालों के सुपुर्द कर दिया गया।
Bollywood films Reviews
प्रियदर्शन की हालिया रिलीज फिल्म 'खट्टा मीठा' हालांकि बॉक्स ऑफिस पर धूल चाटती नजर आई है, लेकिन साउथ की अदाकारा त्रिशा कृष्णन को इस फिल्म में काम करने का कोई अफसोस नहीं है। त्रिशा ने इस फिल्म के साथ बॉलीवुड में डेब्यू किया है। फिल्म की रिलीज के तुरंत बाद त्रिशा से यह बातचीत हुई।
'खट्टा मीठा' में काम करने पर आपको कैसी प्रतिक्रियाएं मिल रही हैंक्
मिलाजुला रेस्पॉन्स है। क्रिटिक्स ने फिल्म को खारिज कर दिया है और दर्शकों का कहना है कि क्रिटिक्स इस फिल्म के बारे में उलटा-पुलटा कुछ लिखेंगे और मुझे उस तरफ ध्यान नहीं देना चाहिए। यह जिंदगी का खेल है, एक अजीब पहेली है जिंदगी भी। कुछ ऎसा ही खेल तब भी हुआ था, जब अक्षय की फिल्म 'हाउसफुल' रिलीज हुई थी। मैंने इस फिल्म के रीव्यू भी पढे हैं, जिनमें फिल्म को बकवास बताया गया है, लेकिन इस फिल्म ने अच्छा बिजनैस किया है। इसलिए 'खट्टा मीठा' के बॉक्स ऑफिस रेस्पॉन्स को लेकर अभी कोई बात करना बहुत जल्दबाजी होगा।
क्या आप सोचती हैं कि 'खट्टा मीठा' की बजाय किसी और फिल्म के जरिए लॉन्च होती, तो ज्यादा अच्छा रहताक्
'खट्टा मीठा' में काम करने का मुझे कोई अफसोस नहीं है। बॉलीवुड में यह मेरा पहला कदम है और मेरा मानना है कि इससे बेहतर शुरूआत नहंी हो सकती- एक बडे डायरेक्टर और एक सुपर स्टार के साथ लॉन्च होना। वैसे भी फिल्म पूरी होने के बाद मैं उससे डिसकनैक्ट हो जाती हूं। कुछ लोगों का यह भी कहना है कि कमिश्नर के रोल के लिए मैं फिट नहीं थी। मेरे कुछ दोस्तों की भी यही राय है। उनका कहना है कि कमिश्नर की बजाय उन्हें मेरा कॉलेज वाला पार्ट ज्यादा पसंद आया।
'जाने तू... या जाने ना ' में आपको प्रतीक बब्बर का काम कैसा लगाक्
मैंने यह फिल्म नहीं देखी है, लेकिन प्रतीक के टैलेंट के बारे में काफी सुना है। अगर मैं गलत नहीं हूं तो उसने फिल्म में जेनेलिया के भाई का रोल किया है। इस फिल्म में भी मेरे साथ वह जो रोल कर रहा है, वह उसे बहुत सूट करता है।
अब आप वापस साउथ की फिल्मों की तरफ ध्यान देंगी या बॉलीवुड में और रोल करना चाहेंगीक्
मैंने यहां प्रतीक बब्बर के साथ फिल्म साइन की है और एक तमिल फिल्म भी कर रही हूं। हिंदी फिल्म में काम करने का अपना अलग मजा है। लेकिन तमिल फिल्मों में मुझे वैरायटी वाले रोल मिल रहे हैं। हाल ही मैंने कमल हासन के साथ एक कॉमेडी फिल्म पूरी की है। प्रतीक बब्बर के साथ मैं जिस फिल्म में काम कर रही हूं वह भी मेरी साउथ की एक हिट फिल्म की रीमेक ही है।
फिल्म के रेस्पॉन्स को लेकर आपने प्रियदर्शन से कोई बात की हैक्
दुबई में फिल्म के रिलीज होने के बाद मैंने प्रियन सर से बात की थी। उनका कहना था कि फिल्म की शुरूआत अच्छी हुई है। आम तौर पर अक्षय की फिल्मों की ओपनिंग अच्छी ही होती है।
'खट्टा मीठा' में काम करने पर आपको कैसी प्रतिक्रियाएं मिल रही हैंक्
मिलाजुला रेस्पॉन्स है। क्रिटिक्स ने फिल्म को खारिज कर दिया है और दर्शकों का कहना है कि क्रिटिक्स इस फिल्म के बारे में उलटा-पुलटा कुछ लिखेंगे और मुझे उस तरफ ध्यान नहीं देना चाहिए। यह जिंदगी का खेल है, एक अजीब पहेली है जिंदगी भी। कुछ ऎसा ही खेल तब भी हुआ था, जब अक्षय की फिल्म 'हाउसफुल' रिलीज हुई थी। मैंने इस फिल्म के रीव्यू भी पढे हैं, जिनमें फिल्म को बकवास बताया गया है, लेकिन इस फिल्म ने अच्छा बिजनैस किया है। इसलिए 'खट्टा मीठा' के बॉक्स ऑफिस रेस्पॉन्स को लेकर अभी कोई बात करना बहुत जल्दबाजी होगा।
क्या आप सोचती हैं कि 'खट्टा मीठा' की बजाय किसी और फिल्म के जरिए लॉन्च होती, तो ज्यादा अच्छा रहताक्
'खट्टा मीठा' में काम करने का मुझे कोई अफसोस नहीं है। बॉलीवुड में यह मेरा पहला कदम है और मेरा मानना है कि इससे बेहतर शुरूआत नहंी हो सकती- एक बडे डायरेक्टर और एक सुपर स्टार के साथ लॉन्च होना। वैसे भी फिल्म पूरी होने के बाद मैं उससे डिसकनैक्ट हो जाती हूं। कुछ लोगों का यह भी कहना है कि कमिश्नर के रोल के लिए मैं फिट नहीं थी। मेरे कुछ दोस्तों की भी यही राय है। उनका कहना है कि कमिश्नर की बजाय उन्हें मेरा कॉलेज वाला पार्ट ज्यादा पसंद आया।
'जाने तू... या जाने ना ' में आपको प्रतीक बब्बर का काम कैसा लगाक्
मैंने यह फिल्म नहीं देखी है, लेकिन प्रतीक के टैलेंट के बारे में काफी सुना है। अगर मैं गलत नहीं हूं तो उसने फिल्म में जेनेलिया के भाई का रोल किया है। इस फिल्म में भी मेरे साथ वह जो रोल कर रहा है, वह उसे बहुत सूट करता है।
अब आप वापस साउथ की फिल्मों की तरफ ध्यान देंगी या बॉलीवुड में और रोल करना चाहेंगीक्
मैंने यहां प्रतीक बब्बर के साथ फिल्म साइन की है और एक तमिल फिल्म भी कर रही हूं। हिंदी फिल्म में काम करने का अपना अलग मजा है। लेकिन तमिल फिल्मों में मुझे वैरायटी वाले रोल मिल रहे हैं। हाल ही मैंने कमल हासन के साथ एक कॉमेडी फिल्म पूरी की है। प्रतीक बब्बर के साथ मैं जिस फिल्म में काम कर रही हूं वह भी मेरी साउथ की एक हिट फिल्म की रीमेक ही है।
फिल्म के रेस्पॉन्स को लेकर आपने प्रियदर्शन से कोई बात की हैक्
दुबई में फिल्म के रिलीज होने के बाद मैंने प्रियन सर से बात की थी। उनका कहना था कि फिल्म की शुरूआत अच्छी हुई है। आम तौर पर अक्षय की फिल्मों की ओपनिंग अच्छी ही होती है।
अभी तक वेस्टर्न ड्रेसेज में नजर आने वालीं सोनम कपूर को हाल ही में 'छोटे उस्ताद' की शूटिंग के दौरान साडी में देखा गया। डिजाइनर साडी के साथ कानों में बडे-बडे झुमके पहने हुईं सोनम बडी आकष्ाüक लग रही थीं। सोनम का कहना है कि वैसे तो मुझे जींस और टी-शर्ट पहनना अच्छा लगता है पर कभी-कभी साडियां पहनना भी अच्छा लगात है। गौरतलब है कि इससे पहले सोनम फिल्म 'आई हैट लव स्टोरी' के 'सदका हुआ' गाने में साडी में नजर आई थीं। डिजाइनर्स की माने तों सोनम का फिगर ऎसा है जिस पर हर ड्रेस सूट करती है, यही वजह है कि जब वह पारम्परिक परिधान साडी पहनती हैं तो वह भी उन पर खूब फबती है।
गुजरा हुआ जमाना
सत्तर के दशक से जुडे रोमांचक किस्सों में अगर आपकी दिलचस्पी है, तो मिलन लूथरिया की फिल्म 'वंस अपॉन ए टाइम इन मंुबई' आपके लिए है। चालीस साल पहले शहर का नाम मुंबई था या बॉम्बे -इस तरह के सवालों को दरकिनार कर दीजिए और अतीत के सुनहरे सफर पर निकल जाइए।
दरअसल बॉलीवुड के फिल्मकार मुंबई के गुजरे हुए दौर के उस कालखंड को फिर से सामने लाने की कोशिशें कर रहे हैं, जब राजेश खन्ना जैसे सितारों का स्टारडम चरम पर था और जायज-नाजायज कारणों से कई साधारण लोग रातोंरात दिग्गज हस्तियों में शामिल हो गए थे। मशहूर लेखिका शोभा डे इसे सेंसेशनल सेवंटीज का नाम देती हैं, तो जाने-माने फिल्मकार विपुल शाह, जो अपनी फिल्म 'एक्शन रिप्ले' में उस दौर को नए सिरे से पेश करने जा रहे हैं, इसे स्टारडम की सबसे दिलचस्प दास्तान बताते हैं। इमरान खान, जिन्होंने 'वंस अपॉन ए टाइम इन मुंबई' के लिए अपने लुक को पूरी तरह चेंज कर लिया, उनका मानना है कि सत्तर के दशक की मुंबई का हिस्सा बनना उनकी जिंदगी का सबसे यादगार लम्हा रहा। उस दौर के जादू से अब ऋतुपर्णो घोष भी नहीं बच पाए हैं। हाल ही उन्होंने सत्तर के दशक में हिंदी और बांग्ला फिल्मों की शीर्ष हीरोइन रहीं सुचित्रा सेन के जीवन और अभिनय सफर पर फिल्म बनाने का एलान किया है।
दरअसल सत्तर का दशक मुंबई के लिए बहुत खास रहा है। जिन लोगों ने उस माहौल को बेहद करीब से देखा है, उनकी यादों में वह दौर आज भी झिलमिला रहा है और जो लोग उस दौर के किस्से-कहानियां सुनकर बडे हुए हैं, वे अपने-अपने अंदाज में बीते हुए कल को फिर से जी लेना चाहते हैं। फराह खान की शाहरूख खान-दीपिका स्टारर फिल्म 'ओम शांति ओम' ऎसी ही एक कोशिश थी, जिसे दर्शकों ने भी भरपूर पसंद किया। फिल्म का हिट डायलॉग 'पिक्चर अभी बाकी है मेरे दोस्त....!' बॉलीवुड के कुछ फिल्मकारों को इतना भाया कि उन्होंने सत्तर के दशक के चंद अफसानों को परदे पर उतारने का फैसला किया। मिलन लूथरिया की 'वंस अपॉन....' और विपुल शाह की 'एक्शन रिप्ले' की गिनती उन फिल्मों में की जा सकती है, जिनमें सेंसेशनल सेवंटीज का स्टारडम नए सिरे से नजर आएगा। 'वंस अपॉन....' का निर्माण एकता कपूर की प्रोडक्शन कंपनी बालाजी ने किया है और सब जानते हैं कि यह फिल्म कुख्यात अपराधी हाजी मस्तान और अंडरवल्र्ड सरगना दाऊद इब्राहिम के जीवन पर आधारित है। सत्तर के दशक की मुंबई पर आधारित यह फिल्म एक पुलिस अफसर के नजरिए से अंडरवल्र्ड के बदलते चेहरे को पेश करती है। इस फिल्म में अजय देवगन और इमरान हाशमी के साथ कंगना राणौत और प्राची देसाई मुख्य भूमिकाओं में हंै। शोभा डे, जिन्होंने मुंबई शहर में सत्तर के दशक में घटे दिलचस्प और रोमांचक किस्सों के बारे में काफी लिखा है, वे भी इस फिल्म के साथ बतौर सलाहकार जुडी हैं।
उधर विपुल शाह की 'एक्शन रिप्ले' में अक्षय कुमार और ऎश्वर्या राय का नया अंदाज देखने को मिलेगा। वे सत्तर के दशक के रेट्रो लुक में परदे पर आएंगे। लंबे, कानों के नीचे तक झूलते बाल, चौडे कॉलर वाली शर्ट और ढीले-ढाले बैलबॉटम में सजे-धजे अक्षय कुमार पहली बार इस फिल्म में ऎश्वर्या के साथ इश्क फरमाते नजर आएंगे। विपुल शाह कहते हैं, 'फिल्म देखने के बाद यह सवाल हर कोई पूछेगा कि इससे पहले किसी ने अक्षय-ऎश्वर्या को बतौर रोमांटिक कपल क्यों लॉन्च नहीं कियाक्'
फिल्म से जुडे लोगों का कहना है कि 'एक्शन रिप्ले' के एक गाने की शूटिंग के दौरान ऎश्वर्या ने 125 टाइप के कॉस्ट्यूम बदले। जाहिर है कि हर कॉस्ट्यूम में सत्तर के दशक के फैशन की झलक दर्शक देख पाएंगे। प्राची देसाई ने भी 'वंस अपॉन....' में डिंपल कपाडिया का 'बॉबी' लुक अपनाने की कोशिश की है। 'बॉबी' ही वो फिल्म थी, जिसने डिंपल को रातोंरात स्टार बना दिया था, हालांकि बाद में डिंपल कभी ऎसी करिश्माई कामयाबी को दोहरा नहीं सकीं। डिंपल के इसी स्टारडम को 'वंस अपॉन...' के जरिए मिलन लूथरिया ने एक बार फिर परदे पर साकार किया है। उधर बांग्ला सिनेमा की ग्रेटा गार्बो सुचित्रा सेन के स्टारडम को दर्शक ऋतुपर्णो घोष की अनाम फिल्म के जरिए एक बार फिर देख पाएंगे। सुचित्रा सेन सत्तर के दशक में बांग्ला और हिंदी फिल्मों की शीर्ष हीरोइन रह चुकी हैं। सुचित्रा ने सत्तर के दशक में 'आंधी' फिल्म में अपने अभिनय के जरिए हिंदी फिल्मों में भी अपनी छाप छोडी थी, लेकिन 1978 में अपनी आखिरी बांग्ला फिल्म 'प्रणय पाशा' के बाद वे सार्वजनिक तौर पर कम ही नजर आई हैं। परदे पर सुचित्रा के रोल के लिए ऋतुपर्णो ने उनकी नातिन राइमा सेन को चुना है। यह शायद पहला मौका है जब किसी हीरोइन को अपनी नानी का किरदार निभाने का मौका मिल रहा है। ऋतुपर्णो की फिल्म में सुचित्रा के जीवन में घटी कुछ प्रमुख घटनाओं का भी चित्रण किया जाएगा। यानी इसके जरिए सुचित्रा के प्रशंसक एक बार फिर अतीत के सुनहरे सफर पर जा सकेंगे।
दरअसल बॉलीवुड के फिल्मकार मुंबई के गुजरे हुए दौर के उस कालखंड को फिर से सामने लाने की कोशिशें कर रहे हैं, जब राजेश खन्ना जैसे सितारों का स्टारडम चरम पर था और जायज-नाजायज कारणों से कई साधारण लोग रातोंरात दिग्गज हस्तियों में शामिल हो गए थे। मशहूर लेखिका शोभा डे इसे सेंसेशनल सेवंटीज का नाम देती हैं, तो जाने-माने फिल्मकार विपुल शाह, जो अपनी फिल्म 'एक्शन रिप्ले' में उस दौर को नए सिरे से पेश करने जा रहे हैं, इसे स्टारडम की सबसे दिलचस्प दास्तान बताते हैं। इमरान खान, जिन्होंने 'वंस अपॉन ए टाइम इन मुंबई' के लिए अपने लुक को पूरी तरह चेंज कर लिया, उनका मानना है कि सत्तर के दशक की मुंबई का हिस्सा बनना उनकी जिंदगी का सबसे यादगार लम्हा रहा। उस दौर के जादू से अब ऋतुपर्णो घोष भी नहीं बच पाए हैं। हाल ही उन्होंने सत्तर के दशक में हिंदी और बांग्ला फिल्मों की शीर्ष हीरोइन रहीं सुचित्रा सेन के जीवन और अभिनय सफर पर फिल्म बनाने का एलान किया है।
दरअसल सत्तर का दशक मुंबई के लिए बहुत खास रहा है। जिन लोगों ने उस माहौल को बेहद करीब से देखा है, उनकी यादों में वह दौर आज भी झिलमिला रहा है और जो लोग उस दौर के किस्से-कहानियां सुनकर बडे हुए हैं, वे अपने-अपने अंदाज में बीते हुए कल को फिर से जी लेना चाहते हैं। फराह खान की शाहरूख खान-दीपिका स्टारर फिल्म 'ओम शांति ओम' ऎसी ही एक कोशिश थी, जिसे दर्शकों ने भी भरपूर पसंद किया। फिल्म का हिट डायलॉग 'पिक्चर अभी बाकी है मेरे दोस्त....!' बॉलीवुड के कुछ फिल्मकारों को इतना भाया कि उन्होंने सत्तर के दशक के चंद अफसानों को परदे पर उतारने का फैसला किया। मिलन लूथरिया की 'वंस अपॉन....' और विपुल शाह की 'एक्शन रिप्ले' की गिनती उन फिल्मों में की जा सकती है, जिनमें सेंसेशनल सेवंटीज का स्टारडम नए सिरे से नजर आएगा। 'वंस अपॉन....' का निर्माण एकता कपूर की प्रोडक्शन कंपनी बालाजी ने किया है और सब जानते हैं कि यह फिल्म कुख्यात अपराधी हाजी मस्तान और अंडरवल्र्ड सरगना दाऊद इब्राहिम के जीवन पर आधारित है। सत्तर के दशक की मुंबई पर आधारित यह फिल्म एक पुलिस अफसर के नजरिए से अंडरवल्र्ड के बदलते चेहरे को पेश करती है। इस फिल्म में अजय देवगन और इमरान हाशमी के साथ कंगना राणौत और प्राची देसाई मुख्य भूमिकाओं में हंै। शोभा डे, जिन्होंने मुंबई शहर में सत्तर के दशक में घटे दिलचस्प और रोमांचक किस्सों के बारे में काफी लिखा है, वे भी इस फिल्म के साथ बतौर सलाहकार जुडी हैं।
उधर विपुल शाह की 'एक्शन रिप्ले' में अक्षय कुमार और ऎश्वर्या राय का नया अंदाज देखने को मिलेगा। वे सत्तर के दशक के रेट्रो लुक में परदे पर आएंगे। लंबे, कानों के नीचे तक झूलते बाल, चौडे कॉलर वाली शर्ट और ढीले-ढाले बैलबॉटम में सजे-धजे अक्षय कुमार पहली बार इस फिल्म में ऎश्वर्या के साथ इश्क फरमाते नजर आएंगे। विपुल शाह कहते हैं, 'फिल्म देखने के बाद यह सवाल हर कोई पूछेगा कि इससे पहले किसी ने अक्षय-ऎश्वर्या को बतौर रोमांटिक कपल क्यों लॉन्च नहीं कियाक्'
फिल्म से जुडे लोगों का कहना है कि 'एक्शन रिप्ले' के एक गाने की शूटिंग के दौरान ऎश्वर्या ने 125 टाइप के कॉस्ट्यूम बदले। जाहिर है कि हर कॉस्ट्यूम में सत्तर के दशक के फैशन की झलक दर्शक देख पाएंगे। प्राची देसाई ने भी 'वंस अपॉन....' में डिंपल कपाडिया का 'बॉबी' लुक अपनाने की कोशिश की है। 'बॉबी' ही वो फिल्म थी, जिसने डिंपल को रातोंरात स्टार बना दिया था, हालांकि बाद में डिंपल कभी ऎसी करिश्माई कामयाबी को दोहरा नहीं सकीं। डिंपल के इसी स्टारडम को 'वंस अपॉन...' के जरिए मिलन लूथरिया ने एक बार फिर परदे पर साकार किया है। उधर बांग्ला सिनेमा की ग्रेटा गार्बो सुचित्रा सेन के स्टारडम को दर्शक ऋतुपर्णो घोष की अनाम फिल्म के जरिए एक बार फिर देख पाएंगे। सुचित्रा सेन सत्तर के दशक में बांग्ला और हिंदी फिल्मों की शीर्ष हीरोइन रह चुकी हैं। सुचित्रा ने सत्तर के दशक में 'आंधी' फिल्म में अपने अभिनय के जरिए हिंदी फिल्मों में भी अपनी छाप छोडी थी, लेकिन 1978 में अपनी आखिरी बांग्ला फिल्म 'प्रणय पाशा' के बाद वे सार्वजनिक तौर पर कम ही नजर आई हैं। परदे पर सुचित्रा के रोल के लिए ऋतुपर्णो ने उनकी नातिन राइमा सेन को चुना है। यह शायद पहला मौका है जब किसी हीरोइन को अपनी नानी का किरदार निभाने का मौका मिल रहा है। ऋतुपर्णो की फिल्म में सुचित्रा के जीवन में घटी कुछ प्रमुख घटनाओं का भी चित्रण किया जाएगा। यानी इसके जरिए सुचित्रा के प्रशंसक एक बार फिर अतीत के सुनहरे सफर पर जा सकेंगे।
हौले हौले से चलती प्रेम कहानी
अनिल कपूर फिल्म कंपनी की फिल्म आयशा इस हफ्ते रिलीज हुई है। इसमें सोनम कपूर और अभय देओल लीड में हैं। फिल्म प्रेम कहानी है लेकिन इतनी धीमी है कि दो घंटे की फिल्म यूं लगती है, जैसे बहुत लंबी चल रही है।
आयशा एक अमीर घर की लडकी है जो मिडिल क्लास टाइप कुछ नहीं करती। उसे चलते फिरते लोगों की जोडियां बनाने में बडी दिलचस्पी है। उसकी सबसे खास दोस्त पिंकी उसके साथ है और बहादुरगढ से आई शेफाली के लिए वे लडका ढूंढ रही हैं। इस भागदौड में शेफाली को वे आधुनिक बनाने पर तुली हैं।
अंतत: आयशा के आदतों से ऊब कर उसकी खास दोस्त उसी आदमी को प्यार करने लगती है जिसका वो अक्सर अपमान करती रहती थी। आयशा अब भी कन्फ्यूज्ड है कि वह किससे प्यार करती हैं। सोनम कपूर, इरा दुबे और आरती पुरी ज्यादातर समय स्क्रीन पर मौजूद रहती हैं और इनके बीच अभय देओल, साइरस साहूकार ओर अरूणोदय सिंह जरूरत के हिसाब से आते हैं।
निर्देशक राजश्री ओझा ने जीन ऑस्टिन के उपन्यास ऎम्मा के कथा सूत्रों से प्रेरित यह फिल्म खडी करने की कोशिश की है लेकिन अव्वल तो इस किस्म की पारिवारिक फिल्मों की भारतीय दर्शकों को आदत नहीं है। दूसरे, उन्होंने फिल्म को बहुत अच्छा नहीं बनाया है।
देविका भगत के स्क्रीनप्ले में झोल नहीं है लेकिन उसकी गति ही उसे कमजोर कर देती है। खासकर इंटरवल से पहले तक तो कहानी कुछ आगे बढती नहीं है। इंटरवल के बाद घटनाएं कुछ होती हैं तो एक लंबे क्लाइमैक्स ने सारी गडबड कर दी। फिल्मांकन अच्छा किया गया है। जावेद अख्तर के ठीक ठाक से गीतों पर अमित त्रिवेदी का संगीत और पाश्र्व संगीत ज्यादा अच्छा है।
कुछ रूमानी क्षणों को निर्देशक ने बहुत अच्छे से हैंडल किया है लेकिन ओवरआल इसकी धीमी गति सपाट कथानक ही मारक है। आपको पता है कि रिलेशनशिप किस किस में विकसित हो सकती है लेकिन वह विकसित होने के दौरान के दृश्य गायब हैं।
कॉलेज गोइंग यूथ और किशोर यदि इसे पसंद करें तो बेहतर हैं। हमारी फिल्मों की प्रेम कहानियों को कालखंड भी छोटा सा होता है। लडका लडकी मिलना, तनाव और प्यार हो जाना। सब कुछ सतही सा। सोनम कपूर अच्छी लगी हैं। उनके पिता की भूमिका में एमके रैना को देखना सुखद है। अभय देओल ने अंडरप्ले किया है लेकिन अपने रोल में वे फिट हैं।
और अब एक स्टुपिड बात। खबर प्रचारित की गई थी कि सोनम कूपर ने पहला ऑन स्क्रीन किस दिया है। क्लाइमैक्स से ठीक पहले अभय देओल सोनम के पलकों के ऊपरी हिस्से के चूमते हैं। फिर अपनी चुटकी में पकडकर उसकी नाक हिलाता है, होठों के करीब आने से पहले कैमरे की आफसाइड अपना मुंह ले जाते हैं। बार बार लॉरेल का मेकअप करती सोनम के होठों पर कोई छुअन तक नहीं हैं। आप इसे किस मानें तो मान लीजिए। एक युवा दर्शक की टिप्पणी सुनिए, यार, इमरान हाशमी और अभय देओल में कुछ तो फर्क होगा ही।
नॉस्टेल्जिक असर वाली माफियाओं की मुंबई
इतिहास अपने आपको दोहराता है। कुछ कहानियां आप कभी भी चुनकर अपने ढंग से कह सकते हैं। गैँगस्टर्स की कहानियां भी ऎसी ही हैं। वन्स अपॉन अ टाइम इन मुंबई निर्माता एकता कपूर और निर्देशक मिलन लूथरिया की ऎसी ही फिल्म है जिसमें मुंबई में माफिया गिरोहों के पनपने की कहानी है।
कहानी में ऎसा संकेत भी दिखता है कि यह हाजी मस्तान और दाऊद इब्राहिम के चरित्रों से प्रेरित हैं। अनाथ बालक सुल्तान मिर्जा एक दिन मुंबई पर राज करने लगता है और उसके पास काम मांगने आया शोएब खान एक दिन उसका सबसे भरोसेमंद आदमी बन जाता है। सुल्तान एक दरियादिल आदमी है, जिसे आप दीवार और मुकद्दर का सिकंदर के अमिताभ, धर्मात्मा के विनोद खन्ना, दयावान के फिरोज खान आदि से मिला सकते हैं। यहां तक कि वह मां को परेशान करने वाले बेटे को भी पीट देता है। तस्कर है लेकिन उन्हीं चीजों की तस्करी करता है जिनके लिए सरकार मना करती है, उनकी नहीं जिनके लिए जमीर मना करता है।
सुल्तान को भी लाल बत्ती का लालच है और दिल्ली में मंत्री से डील करने के लिए जाते समय मुंबई का काम शोएब खान को सौंप गए। शोएब की महत्वाकांक्षाएं ज्यादा बडी हैं और इसकी कीमत सुल्तान को अपनी जान देकर चुकानी पडती है। सुल्तान कभी नहीं चाहता था कि शहर में गंदगी फैले। लेकिन शोएब ने खून खराबा आम कर दिया। कहानी एक पुलिस अफसर विल्सन के फ्लैश बैक में चलती है जिसने इस अपराध बोध में आत्महत्या करने की कोशिश की कि वह इस शहर को तबाही तक पहुंचाने के लिए जिम्मेदार बना। वह जानता था कि माफियाओं के गैर कानूनी कामों को रोका जा सकता था लेकिन वह आपसी गैंगवार से उन्हें मारना चाहता था। आज मार्च 93 के दंगों का भगौडा हमारी पकड में नहीं है।
कुल मिलाकर फिल्म एक पुरानी मुंबई की सैर कराती है और आपको ऊब नहीं होती। लेकिन याद रहे यह सत्या या कंपनी जैसी फिल्म नहीं है। यहां डॉन गंुडा होने के बावजूद मसीहा है। यहां वास्तव का रघु भी नहीं है, जो अपने किए पर एक अंदरूनी यात्रा करता है और पछताता है। प्यार के दृश्यों को भी अच्छा फिल्माया है जब अपनी पसंदीदा अभिनेत्री के लिए सुल्तान मिर्जा एक अमरूद चार सौ रूपए में खरीदकर ले गए। अजय देवगन ने जानदार काम किया है।
इरशाद कामिल के गीत अदभुत हैं और प्रीतम का संगीत भी लोकप्रिय हो ही चुका है। सबसे सुखद अनुभव यही है कि पुरानी सी दिखती मुंबई, पुराने पहनावे, पुराने गहने, सब अच्छे लगते हैं। मिलन लूथरिया की पुरानी फिल्मों से यह बेहतर है लेकिन इसी विषय पर बनी कई और फिल्मों से कमजोर। सत्तर के दशक के डॉयलॉग्स अपने जादू के साथ हैं। जैसे मैं कोयले की खदान में मशाल से रोशनी करने चला था, खदान ही जल उठी। या गुफा में चाहे कितना ही अंधेरा हो किनारे पर रोशनी जरूर होती है। तो एक नॉस्टेल्जिक अनुभव के लिए आप फिल्म देख सकते हैं। यह एक लोकप्रिय मसाला फिल्म है। माफिया पर बनी क्लासिक फिल्म नहीं।
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आयशा एक अमीर घर की लडकी है जो मिडिल क्लास टाइप कुछ नहीं करती। उसे चलते फिरते लोगों की जोडियां बनाने में बडी दिलचस्पी है। उसकी सबसे खास दोस्त पिंकी उसके साथ है और बहादुरगढ से आई शेफाली के लिए वे लडका ढूंढ रही हैं। इस भागदौड में शेफाली को वे आधुनिक बनाने पर तुली हैं।
अंतत: आयशा के आदतों से ऊब कर उसकी खास दोस्त उसी आदमी को प्यार करने लगती है जिसका वो अक्सर अपमान करती रहती थी। आयशा अब भी कन्फ्यूज्ड है कि वह किससे प्यार करती हैं। सोनम कपूर, इरा दुबे और आरती पुरी ज्यादातर समय स्क्रीन पर मौजूद रहती हैं और इनके बीच अभय देओल, साइरस साहूकार ओर अरूणोदय सिंह जरूरत के हिसाब से आते हैं।
निर्देशक राजश्री ओझा ने जीन ऑस्टिन के उपन्यास ऎम्मा के कथा सूत्रों से प्रेरित यह फिल्म खडी करने की कोशिश की है लेकिन अव्वल तो इस किस्म की पारिवारिक फिल्मों की भारतीय दर्शकों को आदत नहीं है। दूसरे, उन्होंने फिल्म को बहुत अच्छा नहीं बनाया है।
देविका भगत के स्क्रीनप्ले में झोल नहीं है लेकिन उसकी गति ही उसे कमजोर कर देती है। खासकर इंटरवल से पहले तक तो कहानी कुछ आगे बढती नहीं है। इंटरवल के बाद घटनाएं कुछ होती हैं तो एक लंबे क्लाइमैक्स ने सारी गडबड कर दी। फिल्मांकन अच्छा किया गया है। जावेद अख्तर के ठीक ठाक से गीतों पर अमित त्रिवेदी का संगीत और पाश्र्व संगीत ज्यादा अच्छा है।
कुछ रूमानी क्षणों को निर्देशक ने बहुत अच्छे से हैंडल किया है लेकिन ओवरआल इसकी धीमी गति सपाट कथानक ही मारक है। आपको पता है कि रिलेशनशिप किस किस में विकसित हो सकती है लेकिन वह विकसित होने के दौरान के दृश्य गायब हैं।
कॉलेज गोइंग यूथ और किशोर यदि इसे पसंद करें तो बेहतर हैं। हमारी फिल्मों की प्रेम कहानियों को कालखंड भी छोटा सा होता है। लडका लडकी मिलना, तनाव और प्यार हो जाना। सब कुछ सतही सा। सोनम कपूर अच्छी लगी हैं। उनके पिता की भूमिका में एमके रैना को देखना सुखद है। अभय देओल ने अंडरप्ले किया है लेकिन अपने रोल में वे फिट हैं।
और अब एक स्टुपिड बात। खबर प्रचारित की गई थी कि सोनम कूपर ने पहला ऑन स्क्रीन किस दिया है। क्लाइमैक्स से ठीक पहले अभय देओल सोनम के पलकों के ऊपरी हिस्से के चूमते हैं। फिर अपनी चुटकी में पकडकर उसकी नाक हिलाता है, होठों के करीब आने से पहले कैमरे की आफसाइड अपना मुंह ले जाते हैं। बार बार लॉरेल का मेकअप करती सोनम के होठों पर कोई छुअन तक नहीं हैं। आप इसे किस मानें तो मान लीजिए। एक युवा दर्शक की टिप्पणी सुनिए, यार, इमरान हाशमी और अभय देओल में कुछ तो फर्क होगा ही।
नॉस्टेल्जिक असर वाली माफियाओं की मुंबई
इतिहास अपने आपको दोहराता है। कुछ कहानियां आप कभी भी चुनकर अपने ढंग से कह सकते हैं। गैँगस्टर्स की कहानियां भी ऎसी ही हैं। वन्स अपॉन अ टाइम इन मुंबई निर्माता एकता कपूर और निर्देशक मिलन लूथरिया की ऎसी ही फिल्म है जिसमें मुंबई में माफिया गिरोहों के पनपने की कहानी है।
कहानी में ऎसा संकेत भी दिखता है कि यह हाजी मस्तान और दाऊद इब्राहिम के चरित्रों से प्रेरित हैं। अनाथ बालक सुल्तान मिर्जा एक दिन मुंबई पर राज करने लगता है और उसके पास काम मांगने आया शोएब खान एक दिन उसका सबसे भरोसेमंद आदमी बन जाता है। सुल्तान एक दरियादिल आदमी है, जिसे आप दीवार और मुकद्दर का सिकंदर के अमिताभ, धर्मात्मा के विनोद खन्ना, दयावान के फिरोज खान आदि से मिला सकते हैं। यहां तक कि वह मां को परेशान करने वाले बेटे को भी पीट देता है। तस्कर है लेकिन उन्हीं चीजों की तस्करी करता है जिनके लिए सरकार मना करती है, उनकी नहीं जिनके लिए जमीर मना करता है।
सुल्तान को भी लाल बत्ती का लालच है और दिल्ली में मंत्री से डील करने के लिए जाते समय मुंबई का काम शोएब खान को सौंप गए। शोएब की महत्वाकांक्षाएं ज्यादा बडी हैं और इसकी कीमत सुल्तान को अपनी जान देकर चुकानी पडती है। सुल्तान कभी नहीं चाहता था कि शहर में गंदगी फैले। लेकिन शोएब ने खून खराबा आम कर दिया। कहानी एक पुलिस अफसर विल्सन के फ्लैश बैक में चलती है जिसने इस अपराध बोध में आत्महत्या करने की कोशिश की कि वह इस शहर को तबाही तक पहुंचाने के लिए जिम्मेदार बना। वह जानता था कि माफियाओं के गैर कानूनी कामों को रोका जा सकता था लेकिन वह आपसी गैंगवार से उन्हें मारना चाहता था। आज मार्च 93 के दंगों का भगौडा हमारी पकड में नहीं है।
कुल मिलाकर फिल्म एक पुरानी मुंबई की सैर कराती है और आपको ऊब नहीं होती। लेकिन याद रहे यह सत्या या कंपनी जैसी फिल्म नहीं है। यहां डॉन गंुडा होने के बावजूद मसीहा है। यहां वास्तव का रघु भी नहीं है, जो अपने किए पर एक अंदरूनी यात्रा करता है और पछताता है। प्यार के दृश्यों को भी अच्छा फिल्माया है जब अपनी पसंदीदा अभिनेत्री के लिए सुल्तान मिर्जा एक अमरूद चार सौ रूपए में खरीदकर ले गए। अजय देवगन ने जानदार काम किया है।
इरशाद कामिल के गीत अदभुत हैं और प्रीतम का संगीत भी लोकप्रिय हो ही चुका है। सबसे सुखद अनुभव यही है कि पुरानी सी दिखती मुंबई, पुराने पहनावे, पुराने गहने, सब अच्छे लगते हैं। मिलन लूथरिया की पुरानी फिल्मों से यह बेहतर है लेकिन इसी विषय पर बनी कई और फिल्मों से कमजोर। सत्तर के दशक के डॉयलॉग्स अपने जादू के साथ हैं। जैसे मैं कोयले की खदान में मशाल से रोशनी करने चला था, खदान ही जल उठी। या गुफा में चाहे कितना ही अंधेरा हो किनारे पर रोशनी जरूर होती है। तो एक नॉस्टेल्जिक अनुभव के लिए आप फिल्म देख सकते हैं। यह एक लोकप्रिय मसाला फिल्म है। माफिया पर बनी क्लासिक फिल्म नहीं।
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Sushil








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